R.D. Saini
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डॉ.सैनी राजस्थान लोक सेवा आयोग के चेयरमैन रह चुके हैं। इससे पहले वे राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी के लगभग डेढ दशक तक निदेशक थे। जहां उनके निर्देशन में ञान-विञान की दो सौ से अधिक पुस्तकों का प्रकाशन सम्भव हुआ जो उच्चशिक्षा के विद्यार्थियों के लिए उपयोगी हैं और हिंदी प्रदेशों के सौ से अधिक विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में अनुशिंत हैं। उन्होंने दो दशक तक महाविद्यालयों में अध्यापन भी किया है। वे अनेक विश्वविद्यालयों वीसी सर्च कमेटियों के मेम्बर रह चुके हैं।
सैनी मूलत: उपन्यासकार हैं। उनके उपन्यास ‘प्रिय ओलिव’ को ‘मीरा अवार्ड’ से नवाजा गया है जो राजस्थान साहित्य अकादमी का सर्वोच्च साहित्यिक पुरस्कार है। इस कृति का इंग्लिश अनुवाद भी छप चुका है। ‘किताब’ का मराठी, गुजराती, राजस्थानी व कन्न्ड़ में अनुवाद हुआ है। उनके उपन्यास में ‘बर्फ’ में भाषा का उत्सव है। ‘स्त्रीगंध’ एवं ‘स्कूल बैंड’ उनके अन्य उपन्यास हैं।
The greatest of writer
Two volumes of his poetry title ‘Katha Shuru hoti hai ‘ and ‘Gun Raha Hai Gaon’ have been published. ‘Bacheche ki Hatheli Par’ is his famous Novel. Further his four non-fictional books have attended Great popularity.

“Writing liberates me.
Overwhelmed by the joy of creation, I find myself in a new world. Dark shadows are left behind.”
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स्कूल बैंड
सन उन्नीस सौ इक्यावन में संतपुरिया बालिका विद्यापीठ, संतपुर के एन.सी.सी बैंड ने पहली बार दिल्ली की गणतंत्र दिवस की परेड में परफॉर्म किया था। इसके बाद साल-दर-साल उसका एक शानदार इतिहास बनता चला गया। किन्तु बासठ साल बाद, दौ हजार बारह में यह कहकर उसे परेड से बाहर कर दिया गया कि वह एक प्राइवेट स्कूल का बैंड है।
प्रिय ओलिव
यह कृति इस सवाल का जवाब देती है कि एक विद्यार्थी में सीखने , याद रखने और उससे सम्प्रेषित करने की क्षमता विकसित करने वाली शिक्षा किसी होनी चाहिए ?
किताब
राजस्थान लोक सेवा आयोग के पूर्व अध्यक्ष डॉ.आर.डी.सैनी लगभग चोदह वर्ष तक राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी के निदेशक भी रह चुके हैं। जहां इनके निर्देशन में उच्चशिक्षा के हिंदी माध्यम के विधार्थीयों के लिए ञान-विञान की दो सौ से अधिक पुस्तकों का लेखन व प्रकाशन संम्भव हुआ। ये पुस्तकें हिंदी प्रदेशों के विभिन्न विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में सन्दर्भ ग्रंथ के रूप में अनुशंसित हैं।
स्त्रीगंध
एक पुरुष जब अपनी पसंद की स्त्री को देखता है तो क्या उसकी गंध उसको खींचती,लुभाती और आत्मविभोर करती है और क्या यह सिर्फ सेक्स होता है या इससे आगे कुछ और भी है?
प्रिय ओलिव
यह कृति इस सवाल का जवाब देती है कि एक विद्यार्थी में सीखने , याद रखने और उससे सम्प्रेषित करने की क्षमता विकसित करने वाली शिक्षा किसी होनी चाहिए ?
बच्चे की हथेली पर
बाल उत्त्पीड़न की अंतःकथाएँ कहता यह उपन्यास उस बच्चे के बारे में आपको नए सिरे से सोचने के लिए बाध्य करता है , जिसके आप माता-पिता हैं अथवा अभिभावक
कथा शुरू होती है
श्री आर. डी. सैनी की कविता शुद्ध भारतीय संस्कार की कविता है, उसमें अपने परिवेक्ष का रंग बहुत गहरा है। आज के काब्य में यह बात वुलंभ होती जा रही है। उनकी कविता को ‘कथा- कविता कहा जा सकता है, जो निश्चित ही एक मोलिक प्रयोग है। कथा में कविता और कविता में बहती कथा का अभिनव प्रयोग, कविता को जन-सामान्य तक सम्प्रेषित करने में सफल रहा है– प्रस्तुत संकलन की रचनाएं “कविता- पोस्टर’ प्रदनियों के माध्यम से भारत में चर्चा का विषय रही हैं। यह चर्चा यहाँ तक बढ़ी कि श्री आर. डी. सैनी को अब “कविता-पोस्टर’ के कवि के रूप में जाना जाता है।
गुन रहा है गांव
अपनी कविता के लिए सैनी एक खास दुनिया रचते हैं – राजा, रानी, राजकुमार, राजकुमारी और आम लोगों की दुनिया। इनके साथ जंगल, दरख्त, नदी और परिंदे भी हैं, जो जरुरत के मुताबिक कविता में जगह बनाते हैं।
Events
‘किताब’ का नाट्य रुपांतरण
22 मार्च 2023 को जयपुर के जवाहर कला केन्द्र में बीस कलाकारों ने अपने अभिनय के द्वारा ‘किताब’ का शानदार प्रदर्शन किया। इस नाटक का निर्देशन वरिष्ठ रंगकर्मी अशोक राही ने किया था।
मीरा अवार्ड (2020-21)
Udaipur, India
25 सितम्बर 2023 को राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर ने एक भव्य समारोह में सैनी को उनकी कृति ‘प्रिय ओलिव ‘ के लिए मीरा पुरस्कार से नवाजा था। अकादमी का यह सर्वोच्च साहित्यिक पुरस्कार है जो वर्ष की श्रेष्ठ सृजनात्मक व दिशापरक कृति को प्रदान किया जाता है। ‘प्रिय ओलिव’ का संदेश है कि मनुष्य एवं पशु परस्पर पूरक हैं।
विश्व पुस्तक मेला 2020, 21, 22
New Delhi, India
सैनी की कृति ‘किताब’ को राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी ने अपने आउटलेट पर प्रस्तुत किया जिसको पाठकों ने उत्साहपूर्वक खरीद की।


"Excellent book.written in a lucid manner higlights pedagogy, psychology,techers attitudes,sociol prejudices n commitment of teachers. "
Dr Reeta Arora
/ Educationist

"प्रोफेसर आरडी सैनी द्वारा बीज ग्रंथ माला -1 के अंतर्गत लिखी "कुछ यूं रचती है हमें किताब" पहली नज़र में अन्य कथा पुस्तकों जैसी काल्पनिक रचना लगी लेकिन अंतिम अध्याय ‘पचास साल बाद’ पढ़ने के बाद मेरी यह धारणा बदल गई. इस अध्याय में लेखक ने इस बात को और प्रतापादित किया है कि किस तरह घर में बीते बचपन की छाप बच्चे के मन, मस्तिष्क, पर ता जिंदगी बनी रहती है, शिक्षकों की हिंसा बच्चों में डर भले ही उत्पन्न करें लेकिन उनमें शिक्षक के प्रति सम्मान भाव उत्पन्न नहीं कर सकती . यह हमारी शिक्षा पद्धति का नकारात्मक पहलू है और इसकी वजह से हमारी शिक्षा बच्चों को आगे पढ़ने के लिए प्रोत्साहित नहीं कर पाती है. इस किताब में प्रोफ़ेसर सैनी ने शिक्षक के व्यवहार स्वभाव और शिक्षण पद्धति बेहतर होने पर बच्चों में उस विषय से लगाव बढ़ने की सम्भावनाओं को इंगित किया है. यह बात सही भी है. वर्तमान में पढ़ाई का मूल्यांकन अधिकांशत: स्मरण शक्ति पर आधारित है जबकि नया शिक्षण शास्त्र वैज्ञानिक आधार तथा दैनिक जीवन में हो रही प्रक्रिया के सीखने सिखाने का पर आधारित हो, ऐसा माना जा रहा है. नई शिक्षा नीति बच्चों के आगे बढ़ने में मददगार और उनके सर्वांगीण विकास के लिए हो तो निश्चय ही समाज का निर्माण होगा. लेखक की जिंदगी को किस तरह घर से दूर ट्रेन में सफर करते हुए एक पुस्तक "टार्जन की वापसी" ने अपने घर वापस लाकर ऊर्जावान कर दिया इस बात का बहुत सुंदर चित्र सहित वर्णन किया गया हैl यह किताब निश्चय ही स्कूली बच्चों के लिए बहुत उपयोगी होगी, और लौ की भांति प्रज्वलित होकर बच्चों में जीवन ज्योति बनाएगी ऐसा मेरा विश्वास है. मुझे प्रोफेसर सैनी के अन्य उपन्यास "बच्चे की हथेली पर तथा संस्मरण "प्रिय ऑलिव" तथा इसका अंग्रेज़ी अनुवाद "माय डियर ऑलिव” पढ़ने का मौका भी मिला. निश्चय ही इस तरह की पुस्तकों के पढ़ने से बच्चों में शिक्षा हासिल करने में जिज्ञासा पैदा होगी तथा एक साधारण गरीब परिवार के बच्चे रामजी में किस प्रकार ललक पैदा हुई तथा राजस्थान लोक सेवा आयोग अजमेर के अध्यक्ष तक पहुंचा यह पूरा वृत्तांत बच्चों को प्रोत्साहित करेगाl . इस पुस्तक के सुरुचिपूर्ण प्रकाशन के लिए हिंदी ग्रंथ अकादमी को साधुवाद. मेरा तो अनुरोध है कि अकादमी इस पुस्तक का अधिकाधिक प्रचार करे और अगर सम्भव हो तो बच्चों को इसे निशुल्क अथवा न्यूनतम मूल्य पर उपलब्ध कराया जाए.."
डॉ दिनेश गुप्ता
/ प्रोफेसर

"डा. आर. डी. सैनी की यह कृति एक विद्यार्थी द्वारा खुद की खोज, क्षमता- वर्धन और सीखने की स्वतंत्र प्रक्रियाओं पर प्रकाश डालती है और बताती है कि इससे एक बच्चे के व्यक्तित्व का निर्माण कैसे होता है? इसके साथ- साथ यह मौजूदा शिक्षा की बदहाली पर सवाल खडे करके एक ऐसी शिक्षा प्रणाली की आवश्यकता की ओर संकेत करती है जो पिछड़े, गरीब, वंचित व अभाव- ग्रस्त वर्गों के निरीह बच्चों की आशाओं और अपेक्षाओं के अनुरूप हो। इस तरह यह शैक्षिक विमर्श की एक खुली खिडकी है। इस किताब को पढते हुए एक तरफ तो मैं अपने बचपन और शिक्षण की स्मृतियों में आता- जाता रहा तो दूसरी तरफ विद्यार्थियों, विद्यालयों, शिक्षा- पद्धतियों और शिक्षकों के हालात को एक बच्चे की नज़र से देखता व परखता चला गया। इस कृति की यह बड़ी विशेषता है कि यह आपको शिक्षा- तंत्र पर सोचने के लिए उद्वेलित करती है। इस कृति में किताब को लेकर जो सकारात्मक सूत्र मिलते हैं , वह लेखक के उस मौलिक अनुभव, चिन्तन, अध्ययन और लेखन से निसृत हैं जिसमें किताब उसकी तारनहार है और उसकी अटूट आस्था है कि किताब की दोस्ती कभी भी दगा नहीं देती। हम देखते हैं कि किस तरह रामजी में एक किताब ने आत्मविश्वास और साहस का संचार किया। उसको अपनी तरह पढने वाले दोस्त मिले और उनमें संवाद शुरू हुआ। यह भी एक तथ्य है कि संवाद की सीखने में अहम भूमिका होती है। संवाद वस्तुत: प्रश्न और अनुभवों का आदान- प्रदान है। बच्चों में यह प्रक्रिया सीखने को आगे बढाती है। इस तरह यह एक ऐसे बच्चे की सक्सेस स्टोरी है जो एक किताब की रोशनी से रास्ता बनाकर अपने जुनून और संघर्ष से खास मुकाम तक पहुंचता है और जहां से मुखातिब होकर वह हमें एक शैक्षिक विमर्श में सक्रिय रूप से शामिल होने के लिए आमंत्रित करता है। किताब हाल ही राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी से प्रकाशित हुई है।" "
डॉ. राजाराम भादू


"आर. डी. सैनी ने अपनी इस कृति में एक बिल्कुल नए विषय को उठाया है (यह काम वे अपनी हर कृति में करते हैं!) और उस विषय के निर्वहन का उनका ढब भी अनूठा है. राजाराम भादू की सुविचारित प्रारम्भिक टीप ने इस किताब की उपादेयता को और ज़्यादा बढ़ा दिया है| एक सुख यह भी है कि लेखक, भूमिका लेखक और प्रकाशक तीनों को हार्दिक बधाई. मुझे पूरा विश्वास है कि जिनकी शिक्षा में तनिक भी रुचि है वे इस किताब को ज़रूर पढ़ेंगे| "
डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल


"जिंदगी के असल करघे पर बुनी गई एक सचाई ... एक अनोखी 'किताब'| "
रामानंद राठी


"जब मैंने पहली बार ' किताब ' की स्क्रिप्ट पढ़ी तो मुझे लगा कि एक सृजनात्मक ऊर्जा की मुझमें लहरें उठ रहीं हैं। और बस मैं रेखांकन करता गया। मेरे जहन में बस 12-13 साल का रामजी नाम का एक विद्यार्थी था जो अपने परिवेश, परिवार,स्कूल और टीचर्स से उकताया हुआ था। इस किताब के कुछ रेखांकन फेसबुक द्वारा आप तक पंहुचा रहा हूँ l यह 'किताब' राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी द्वारा पब्लिश की गई है l ' किताब ' में मुझे रेखांकन करने का अवसर मिला, यह मेरा सौभाग्य है |"
कुमार रेन


" जो बच्चे फेल हो जाते हैं , वे तथाकथित आदम के सांचे नहीं बन पाते. इन तथाकथित बेडौल सांचो को कोई नहीं अपनाना चाहता , यहां तक कि उनका परिवार भी नहीं . इसकी परिणति होती है बच्चे के नितांत अकेले होते जाने में . ऐसे ही एक अकेले होते जाते बच्चे 'रामजी भाई' की कहानी बताती है आर.डी सैनी की नई पुस्तक ' किताब '| जर्जर और सीलन भरी शिक्षा पद्धति के साथ तारतम्य न बिठा पाने पर अकेलेपन के कुहासे में भटकने को अभिशप्त बच्चे के लिए एक किताब जादुई और तिलिस्मी दुनिया खोल सकती है . वह दुनिया जहां अन्याय और भेदभाव नहीं है , जहां बातचीत के लिए अनेक संगी साथी हैं . बच्चे के हिल चुके आत्मविश्वास को फिर से पटरी पर लाने में भी यह किताब मदद करती है . सभी बच्चे 'रामजी' की तरह भाग्यशाली नहीं होते . उन्हें वह किताब कभी नहीं मिलती जो उनका जीवन बदल सके . उनके जीवन में टार्जन की वापसी ( रामजी भाई को मिली किताब ) नहीं होती , टॉर्चर का स्थाई भाव बना रहता है . मोहन राकेश अपनी डायरी में लिखते हैं शिक्षा का उद्देश्य है यह सिखाना "हाउ टु थिंक" लेकिन स्वतंत्र सोचने के लिए जिस कल्पना शक्ति की आवश्यकता होती है ,उसका दम हमारी पारंपरिक शिक्षा प्रणाली बहुत पहले घोट देती है | राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी की बीजग्रंथ माला की यह पहली किताब है . अकादमी की इस पहल का स्वागत होना चाहिए . यह किताब शिक्षा के व्यापक संदर्भ और फलक पर रोशनी डालती है साथ ही शिक्षा से दूर करने वाले समाजशास्त्रीय , आर्थिक , मनोवैज्ञानिक कारणों को भी सूक्ष्मता से अंकित करती है . लेखक ने जीवन के एक दृष्टांत के माध्यम से एक सक्सेस स्टोरी पाठक के सामने रखी है जो शिक्षा के स्टेक होल्डर के सामने आती है | इस किताब की एक उपलब्धि यह भी है कि लेखक अपनी तरफ से कोई भी चीज थोपने का प्रयास नहीं करता . सब कुछ कथा के अंतःसूत्रों के माध्यम से स्वाभाविक और सहज रूप से सामने आता है । भाषा कमाल की सादगी और सुबोधता लिए हुए है । सोने पर सुहागा यह है की प्रसिद्ध शिक्षाविद और आलोचक राजाराम भादू का बीज वक्तव्य इसमें शामिल है , जो शिक्षा से जुड़े सभी आयामों पर एक नए सिरे से विमर्श की मांग करता है । "
नितिन यादव
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