एक राजा बहुत परेशान था। परेशानी का सबब था कि उसके राज में बोया गया बीज उगता नहीं था। राजा जी के बाग के पेड़-पौधे भी नंगे खडे़ थे। उन पर फल-फूल लगना तो दूर, पत्ते तक नहीं आते थे।
कई बरसातें गुजर चुकी थी किन्तु हरियाली मानों उधर का रास्ता भूल गयी थी। किसान खाली खेतों को देखकर कलपते थे। कारोबारी जल्दी से जल्दी दिसावर जाना चाहते थे। चारों तरफ हाहाकार था।
बहुत जतन के बाद निराश राजा ने मुनादी करवायी कि हरियाली लौटाने वाले को मुंह मांगा ईनाम दिया जायेगा।
भांत-भांत के टोने-टोटके, पूजा-पाठ, जन्तर-मन्तर और हवन-अनुष्ठान किये गये। परन्तु हरियाली लौटकर नहीं आयी।
राज धधकते एक मसान में बदलता जाता था। राजा के रात-दिन यूं बडे़ होने लगे कि काटे नहीं कटते थे।
एक दिन रमता हुआ कहीं से एक सफेद झक दाढ़ी वाला संन्यासी राजदरबार में आया। राजा का दर्द जानकर संन्यासी मुस्कुरा कर बोला,‘‘हे राजन! अपना मुकुट सिंहासन पर रख दो। एक फावड़ा कंधे पर रख लो और इसी पल नंगे पांव मेरे पीछे-पीछे चले आओ।’’
आगे-आगे संन्यासी और उसके कहे मुताबिक राजा पीछे-पीछे चल पड़ा। रात-दिन, धर मंजला-धर कूंचा, चलते-चलते वे एक रेतीले मैदान में पहुंचे। राज के बीचों-बीच बहने वाली नदी के पाट से लगता वह एक खेत था।
संन्यासी ने एक नजर नदी पर डाली। नदी का पानी एक पतली लकीर की तरह दिख पड़ता था। संन्यासी ने अपने चारों तरफ देखा, फिर चार कदम पीछे हटकर उसने कमण्डल के पानी से जमीन पर छींटे दिये।
‘‘यहां पर खुदाई शुरू करो।’’ संन्यासी ने आदेशात्मक स्वर में राजा से कहा। राजा आदेश की अनुपालना में जुट गया। कुछ हटकर संन्यासी ने आसन लगाकर कहा,‘‘ध्यान रहे कि खुदाई में निकलने वाली कोई भी चीज टूट ना पाये।’’ इसके बाद वह ध्यानमग्न हो गया।
गड्ढा गहरा होता गया। खुदाई में कोई भी चीज निकलती तो हिफाजत के साथ राजा उसको संन्यासी के सामने रखकर पुनः गड्ढे में उतर जाता।
सबसे पहले कांसे की थाली, फिर दरांती और मिट्टी का एक घड़ा निकला। इनको एक-एक करके राजा संन्यासी के सामने पेश कर चुका था।
गड्ढा गहरा होता गया।
एक दिन उसमें से एक नरमुण्ड़ निकला। डरते-डरते राजा ने नरमुण्ड़ से लगी मिट्टी को हटाया और उसे संन्यासी के सामने पेश किया।
ध्यान में डूबे संन्यासी की आंखें खुद-ब-खुद खुल गयी। उसके मुख पर मुस्कान और आंखों में चमक थी। उसने हाल-बेहाल खडे़ राजा से कहा,‘‘बैठ जाओ।’’ फिर कमण्ड़ल के पानी से नरमुण्ड को छींटे दिये। छींटे लगते ही नरमुण्ड़ गटगट हंसने लगा।
संन्यासी ने राजा से कहा,‘‘हे राजन! इस नरमुण्ड से तुम पूछ सकते हो कि तुम्हारे राज में बोया गया बीज उगता क्यों नहीं है?’’
राजा के पूछने पर नरमुण्ड देर तक गटगट हंसता रहा। फिर उसने बताया,‘‘हे राजा! तुम जिस जमीन पर खुदाई कर रहे हो, उस पर मेरे वक्त के लोगों को तड़पा-तड़पाकर मारा गया था। हमारे हरे-भरे खेतों को जला दिया गया या तहस-नहस कर दिया गया था। वे सैनिक, वे घुड़सवार तुम्हारे पुरखों की सेना के थे। आज यहां के चप्पे-चप्पे में भूखे-प्यासे बेकसूर लोगों की चीखें दफन हैं। यह जो नदी है, इसमें तुम्हारी सेनाओं ने कई बार अपनी रक्त से सनी तलवारें धोई हैं। इसलिए इसका पानी सूख गया है। यही नहीं।’’
‘‘बस-बस।’’ थर-थर कांपते राजा ने गुहार की परन्तु नरमुण्ड़ का कथन रूका नहीं। वह कहता गया, कोई सुने, चाहे ना सुने, नरमुण्ड का कथन आज भी जारी है।