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एक ठिठोली पसंद राजा था। भरे दरबार में एक रोज उसे ठिठोली सूझी कि अचानक सिंहासन से उठ खड़ा हुआ। हाथों से उतारकर अपना मुकुट सिंहासन पर रख दिया। दरबार में मौजूद सामंतों से हुक्मराना अंदाज में बोला, ‘‘राजपाट से मैं ऊब चुका हूँ। यह सिंहासन, यह मुकुट आप लोगों के हवाले है। मैं इस क्षण इसका परित्याग करके संन्यास लेना चाहता हूँ।’’ फिर वजीर की ओर नजर उठाकर कहने लगा, ‘‘आप लोगों में से जो भी मुकुट धारण कर ले, उसको नया राजा मान लिया जाये। मुझे बस इसकी खबर कर देना। इसके बाद में सब छोड-छाड़कर वन के लिए प्रस्थान करना चाहूँगा। कुछ दिन हरि भजन करूं तो मन को शांति मिले।

तमाम राव-उमराव हैरत में डूब गये और राजा रंगमहल में चला गया।

रंगमहल में राजा आराम से सोया था परन्तु बगल में बैठी महारानी की हालत खस्ता थी। उसकी बेचैनी बढ़ते-बढ़ते इस कदर बढ़ी कि उसने झकझोर के राजा को जगाया और बोली, ‘‘दुपहर का सूरज कब का ढल चुका… सांझ घिर आई है परन्तु अभी तक वजीर खबर लेकर नहीं आया। क्या मुकुट धारण करने में इतनी देर लगती है?’’

राजा गावतकियांे पर कुहनियां टिकाकर अधलेटा होकर मुस्कुराया और बोला, ‘‘आप क्या सोचती हैं?’’

महारानी बोली, ‘‘इतने में तो दुल्हन का सिंगार भी पूरा हो जाता है। भला मुकुट धारण करने में इतनी देर….?’’

तभी खास खवास ने हाजिर होने की इजाजत मांगी। खवास ने खबर सुनाई, ‘‘अन्नदाता। आपस में लड़कर उमराव ढेर हुए पडे़ हैं। वजीर, सेनापति और दीवान जी भी काम आये।’’

राजा ने पहले रानी की तरफ देखा और फिर खवास से पूछा, ‘‘तुम कैसे बच गये?’’

खवास बोला, ‘‘हुजूर मैं इसलिए बच गया कि मैंने राजमुकुट धारण करने की उस होड़ में भाग नहीं लिया।’’

अब सवाल करने की बारी महारानी की थी। उसने पूछ ही लिया, ‘‘क्या तुम को राजपाट पसंद नहीं है?’’

खवास ने जवाब दिया, ‘‘माफ करें अन्नदाता! राजपाट सबको अच्छा लगता है परन्तु मुकुट धारण करने से राजपाट मिल जाये तो तमाशा करने वाले दुनिया के सारे भांड राजा बन गये होते।’’

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