शिकार को निकले एक राजा को जंगल का हरा-भरा खास इलाका पसन्द आया। उसने हुक्म दिया कि यहां हमारे लिए एक महल बनवाया जाये।
मंत्री ने हिचकिचाते हुए कहा- ‘‘हुजूर! यहां तो घने पेड़ हैं। बगल में झरने बहते हैं। पेड़ों को काटना पडे़गा। झरनों का रूख बदलना पडे़गा।’’
राजा कुदरत के उस खूबसूरत मंजर पर मुग्ध था, बोला ‘‘महल यहीं बनेगा।’’
पेड़ काट दिये गये। झरनों का रूख बदल दिया गया और एक आलीशान महल देखते ही देखते बनकर तैयार हो गया।
राजा खुशी-खुशी महल में रहने के लिए आया परन्तु एक-दो रोज के बाद ही उसको उदासी और बैचेनी ने घेर लिया। एक ढ़लती हुई सांझ में राजा अपने महल की छत पर कुदरत का वह पहले वाला नजारा देखने के लिए चढ़ा। महल के आसपास हरियाली का नामोनिशान नहीं था। वह दंग रह गया। वे लूमते-झूमते दरख्त… खिलखिलाते फूल-पत्ते … चहचहाते परिन्दे … कल-कल बहता निर्मल जल वाला मंजर गायब था।
चारों तरफ वैसा ही सूना और वीराना था जैसा उसके भीतर था। वैसी ही बेचैनी और वैसी ही उदासी थी जैसी उसके भीतर थी।
उस रात राजा बड़ी मुश्किल से सोया तो सपने में उसे पक्षियों के लिए घोसले बनाता, पेड़ों में पानी देता, जानवरों के जख्मों पर मरहम पट्टी करता एक फकीर दिखाई दिया।
दूसरे दिन राजा अपने लावलश्कर के साथ महल खाली करके राजधानी लौट गया और फिर कभी उसने उस महल की तरफ लौटने की हिम्मत नहीं की।
झाड़-झंरवाड़ और पेड़-पौधे नये सिरे से फिर उगते चले गये। समय तो लगा परन्तु एक दिन वह महल उजड़ गया। पेड़ ज्यूं-ज्यूं गहराते गये जंगल की रौनक लौट आयी और फिर परिन्दों ने उन पेड़ों पर अपने घरोंदे बनाये।
परन्तु झरनों को फूटता देखने के लिए परिन्दों की पीढ़ियाँ खप गयी।